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पारसमणि......(मंच के वरिष्ट ब्लोगर्स को समर्पित)

Posted On: 17 Sep, 2012 Others,मस्ती मालगाड़ी में

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dakuप्राचीन भारत के एक नगर में दिनेशभूषण नामक एक विद्वान पंडित रहते थे, लेखन उनका व्यवसाय था! उन्होंने अपनी रचनाओं के द्वारा केवल धन ही नहीं, यश भी कमाया था, उनकी रचनायें देश-प्रेम, चरित्र-निर्माण और मानवता आदि गुणों से ओतप्रोत थीं!
उस समय विक्रम सिंह नामक एक भयंकर डाकू का आतंक चारों तरफ छाया हुआ था. लोग उसके नाम से थर-थर कांपते थे. किसी को भी दिन दिहाड़े लूट लेना और क़त्ल कर देना उसके बाएँ हाथ का खेल था. दया उसके ह्रदय में नाममात्र भी नहीं थी.
एक दिन उसने गिरोह के साथ दिनेशभूषण के घर पर धावा बोल दिया, वह अपनी बन्दूक पंडित जी की तरफ कर के खड़ा हुआ,
”पहले जलपान कर लीजिये, ऐसी भी क्या जल्दी है”, दिनेशभूषण जी ने शांत भाव से कहा!
”हम फालतू बातें नहीं सुनना चाहते, जो हम कह रहे हैं, वही करो,” विक्रम सिंह ने कडकती आवाज़ में कहा.
”यह लीजिये” तिजोरी की चाबी फेंकते हुए दिनेशभूषण जी ने कहा, ”तिजोरी के पहले खाने में सोना-आभूषण हैं, दूसरे खाने में जवाहरात हैं और तीसरे खाने में नगदी वगैरह है, चांदी वहां जमीन में दबा कर रखी गयी है. जितनी चाहे ले लो.”
विक्रम सिंह के साथियों ने देखते ही देखते सारा माल तुरंत अपने कब्ज़े में ले लिया.
दिनेशभूषण जी को लूट कर विक्रम सिंह जब चलने को हुआ, तब पंडित जी ने कहा, ”सिंह साहब, जलपान तो कर ही लेते. यहाँ जल भी है और मौका भी है. फिर ना जाने कब मौका मिले.”
”तुम्हे माल जाने का गम नहीं है, पंडित जी,” विक्रम सिंह बोला, ”आज तक हम ने इतनी डकैतियां डालीं, पर किसी ने भी इस तरह हंसी-ख़ुशी अपना माल नहीं दिया, किसी को मारा-पीता, कहीं डराया-धमकाया, कहीं-कहीं क़त्ल भी करना पड़ा, लेकिन आपने सारा माल स्वेच्छा से दे दिया, हमें ताज्जुब हो रहा है…..”
”मैंने अपने जीवन में खूब धन और यश कमाया है, दिनेशभूषण जी ने गर्व से कहा, ”अपनी एक-एक रचना से मुझे अपार धन प्राप्त हुआ है, अभी मैंने ‘पारसमणि’ की रचना की है, उससे अपार धन और नाम की प्राप्ति होगी.मेरी रचनाओं की पाठक बड़ी बेसब्री से प्रतीक्षा करते हैं. मैं धन के लिए नहीं, नाम के लिए जीता हूँ, नाम, धन से कहीं बढकर है.”
‘यह पारसमणि’ क्या है?” विक्रम सिंह ने पुछा.
”पारसमणि’ मेरी नई रचना है, जिसमें भारत के प्राचीन आदर्शवादी महापुरषों के चरित्र, त्याग और उत्तम आचरणों का वर्णन किया गया है. इसके अध्धयन से पाठक अपना जीवन उन जैसा ही महान बना सकते हैं. ईश्वर की बनाई हुए पारसमणि लोहे को सोना बना देती है, पर यह ‘पारसमणि’ मनुष्य को महापुरुषों जैसा बनाएगी.” दिनेशभूषण जी ने कहा.
”तब तो हम यह ‘पारसमणि’ ही लेंगे.” विक्रम सिंह बोला, ”हमें तुम्हारा माल नहीं चाहिए और हम आज से डकैती भी नहीं डालेंगे.”
पंडित दिनेशभूषण जी, मुस्कुराते हुए बोले, ”पारसमणि भी ले जाओ, विक्रम सिंह और माल भी.”
विक्रम सिंह और उसके साथियों पर पंडित जी के व्यवहार और उनकी ‘पारसमणि’ का इतना असर पड़ा, कि वे माल वहीँ छोड़ कर वापस चले गए और उसी दिन से उन्होंने डकैती डालना भी छोड़ दिया…….



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66 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Midge के द्वारा
October 17, 2016

The truth just shines thgruoh your post

Foge के द्वारा
October 17, 2016

Enithgienlng the world, one helpful article at a time.

drbhupendra के द्वारा
September 24, 2012

पारसमणि …. असली है ये पारस मणि जो व्यक्ति को परमात्मा बना रही है

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 24, 2012

    आपका हार्दिक स्वागत है…….भूपेंदर जी…….. और हार्दिक धन्यवाद भी…….

ashishgonda के द्वारा
September 22, 2012
    vikramjitsingh के द्वारा
    September 23, 2012

    आशीष जी……आप का हार्दिक धन्यवाद……

    Starleigh के द्वारा
    October 17, 2016

    Syaja, Pekej Nur Kasih RM17500 (Tujuh belas ribu lima ratus) dan ini termasuk semua sekali dalam pakej tebeurst. Bayaran transport RM500 dikenakan untuk di luar Lembah Klang.

September 22, 2012

सुंदर रचना..

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 22, 2012

    धन्यवाद वर्मा जी…..

    Molly के द्वारा
    October 17, 2016

    / Hola Álvaro, Bueno, nosotros creemos que no venía mal este artículo para aprovechar y hacer referencia al primer Macintosh: cómo era, qué cas­rterÃacticas tenía. Seguro que a más de uno le interesa. Como te dice Antonio, se agradecen tus palabras, que cuanto menos son sinceras Un saludo.

D33P के द्वारा
September 19, 2012

आपके इस ब्लॉग को पढकर पहले भी दिल में यही ख्याल आया था ईश्वर की बनाई हुए पारसमणि लोहे को सोना बना देती है, पर यह ‘पारसमणि’ रचना मनुष्य को महापुरुषों जैसा बनाएगी….और पारसमणि के संपर्क में आते ही डाकू विक्रम सिंह डकैती डालना छोड़कर लेखक ” विक्रम जीत सिंह” हो गए ! और यही से मधुरता का आरम्भ हुआ ………..

    jlsingh के द्वारा
    September 19, 2012

    आदरणीय दीप्ति जी एवं विक्रमजीत सिंह जी, अब मेरे कहने के लिए बचा क्या है ? हम सब में आपसी माधुर्य बना रहे ईश्वर से यही कामना है. आपदोनों को नमन!

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 20, 2012

    आदरणीया दीप्ति जी…..सादर….. आपकी इस ‘गौरवमयी’ प्रतिक्रिया का जवाब देने के लिए हमारे पास शब्द नहीं हैं……. फिलहाल……’हार्दिक धन्यवाद’ से ही काम चलाइये…….

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 20, 2012

    आदरणीय जवाहर जी…..सादर…… नमन काहे करते हैं……प्रभु…. आप से छोटे हैं……(दीप्ति जी का पता नहीं…..???) हमें तो बस आशीर्वाद दीजिये…….(नाना जी की तरह) हार्दिक धन्यवाद……

Aniket mishra के द्वारा
September 19, 2012

बहुत सुन्दर रचना है आपकी रचना बधाई हो …..

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 20, 2012

    अनिकेत जी….. आप का हार्दिक धन्यवाद…..

rajpal singh के द्वारा
September 19, 2012

hamesha di taran vadhiya article, bahut vadhiya thanks, vikram veer

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 19, 2012

    धन्यवाद……. राजपाल सिंह जी…… (शुक्र है…..फेसबुक से फुर्सत तो मिली….)

Chandan rai के द्वारा
September 19, 2012

विक्रम जी , मै इस कथा का पुर्वानंद ले चूका है ,पुनह एक बार कथा पाठ कर संवेदनाएं आचरण के महत्त्व को समझ गई !

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 19, 2012

    चन्दन जी….. आप तो इस कथा का पूर्वालोकन कर चुके हैं…….धन्यवाद…. लेकिन शायद आप को नहीं पता होगा……कि हम…आप से किसी ऐसे ही कमेन्ट की उम्मीद कर रहे थे……एक बार फिर से धन्यवाद……जो आप हमारी उम्मीदों पर खरे उतरे……/// (अरे हाँ…..हमें तो अभी पता लगा…..आप को हिंदी भी आती है……कमाल है…..??? आप तो ज़्यादातर इंग्लिश में ही कमेन्ट करते हैं ना…..इसलिए कहा……)

rekhafbd के द्वारा
September 19, 2012

विक्रम जी ,खूबसूरत कहानी ,आज हमारे देश में पारसमणि की अत्यधिक आवश्यकता है ,हार्दिक बधाई .

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 19, 2012

    आदरणीया रेखा जी….. आप का हार्दिक धन्यवाद…….

yogi sarswat के द्वारा
September 19, 2012

गज़ब लिखा है भाई विक्रमजीत सिंह जी ! ये पारसमणि बड़ी कीमती चीज है ! मैं इस कहानी को आपकी ब्लॉग पर पहले भी पढ़ चूका हूँ , लेकिन आज भी वाही अंदाज़ , वाही ख़ुशी !

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 19, 2012

    आपका हार्दिक धन्यवाद…….प्रिय मित्र योगी जी……

vivek bhandari के द्वारा
September 19, 2012

बढ़िया विचार लिए हुए सुन्दर कहानी.

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 19, 2012

    धन्यवाद विवेक जी……

dineshaastik के द्वारा
September 19, 2012

विक्रम जी, नमस्कार…. बहुत ही सुन्दर संदेश देती हुई कहानी….संभवतः इसे आप पहिले भी पोस्ट कर चुके हैं।

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 19, 2012

    आदरणीय दिनेश जी….सादर नमस्कार….. सत्य कहा आपने…… आपका हार्दिक धन्यवाद…..

September 18, 2012

सादर प्रणाम! पुरानी कहानी को ……………………………………..बहुर ही सुन्दर, मनोरंजक और ज्ञानवर्धक मोड़ दिया है आपने………..हार्दिक आभार……..! http://merisada.jagranjunction.com/2012/09/13/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%9D-%E0%A4%9C%E0%A5%88%E0%A4%B8%E0%A4%BE-%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%81-%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%AB%E0%A4%BF%E0%A4%B0-%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%81-%E0%A4%9C/

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 19, 2012

    प्रिय अनिल जी…..सादर नमस्कार….. आपने सही कहा…..ये ‘वही’ पुरानी कहानी है…..जिस ने इस मंच को ही एक नया ‘मोड़’ दे दिया था….. हा…..हा…..हा….. स्मृति काफी अच्छी है आपकी……धन्यवाद…..

annurag sharma(Administrator) के द्वारा
September 18, 2012

विक्रम जी पहले तो मै आपको इस आलेख के लिये मुबारकबाद देता हूँ ,क्योकि आपने संगत के एक गुन की सीख दी है, और इन पीताम्बर जी जैसे लोगो की आलोचना करने के ढंग पर तरस आता है ,।

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 19, 2012

    आदरणीय अनुराग जी……सादर…. मुबारकबाद के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद…… पीताम्बर जी भी हमारे लिए उतने ही ‘आदरणीय’ हैं…..जितने बाकी वरिष्ट ब्लोगर्स…..उन्होंने कोई आलोचना नहीं की…..थोड़ी शंका थी उन्हें जिसका निराकरण आदरणीया मातेश्वरी ने कर दिया है….. सादर……

bhanuprakashsharma के द्वारा
September 18, 2012

सुंदर और प्रेरक कथा। ऐसी कथा लिखते रहिए। हो सकता है कि हमारे देश में भ्रष्टाचारी भी पढ़े और इससे सबक लें। 

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 19, 2012

    आदरणीय शर्मा जी……सादर…. आप का स्वागत है ब्लॉग पर……और हार्दिक धन्यवाद भी….. ऐसे ही संवाद बनाये रखें…. सादर….

    Evaline के द्वारा
    October 17, 2016

    If inmiofatron were soccer, this would be a goooooal!

manoranjanthakur के द्वारा
September 18, 2012

इस पारशमणि की जरूरत नेताओ को है काश …..ऐसा होता बहुत सुंदर कथा बाचन के लिए सुंदर बधाई

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 19, 2012

    आपका हार्दिक धन्यवाद….. आदरणीय मनोरंजन जी……

Santosh Kumar के द्वारा
September 17, 2012

विक्रम भाई ,..सादर नमस्ते आदरणीय चातक जी से पूरा सहमत हूँ ,….पारसमणि आपमें भी है ,…यह कथा आपके ब्लॉग पर पहले भी पढ़ी लगती है ,..डाकू विक्रम सिंह की जय !….आजकल इतने सह्रदय डाकू मिलने नामुमकिन नहीं तो मुश्किल जरूर है ,…पंडित दिनेशभूषण जी का अभिनन्दन ,..ईश्वर करें आप दोनों दिन दूनी रात चौगुनी कमाई (बौद्धिक) करते रहें ,…बहुत बधाई ,..हार्दिक शुभकामनाये

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 19, 2012

    आपका हार्दिक अभिनन्दन…..आदरणीय संतोष भाई…… सत्य है……ये कथा पुरानी है….पहले भी हमारे ब्लॉग पर प्रेषित हो चुकी है….. आप का हार्दिक धन्यवाद…..

DR. PITAMBER THAKWANI के द्वारा
September 17, 2012

निशाजी, एवं विक्रम जीत जी,आपकी कथा को निशा जी ने सूनी हुयी बताया है ,उन्हें याद दिलवाने के लिए कहना चाहूंगा की वह है सुदर्शन की कहानी – “हार की जीत “, यह बिलकुल वैसी ही है ! खैर इससे मेरी अतिरिक्त जानकारी बढी मै आपका आभारी हूँ !आप ने सुन्दर सन्देश दे कर हमें माला माल कर दिया यह भी हमारे लिए क्या ‘पारसमणि’ से कम है? मुझे एक और उपलब्धि हासिल हुई ,मै अपने को अब ‘मंच के वरिष्ठ ब्लागर्स’ में मानूंगा, इस रचना को पद कर ,जिसका श्रेय आपको,विकर्म जीत जी को ही जाता है!

    nishamittal के द्वारा
    September 17, 2012

    नहीं पीताम्बर जी हार की जीई कहानी का मुझको स्मरण है,सुल्तान,बाबा भारती खड़क सिंह सब कुछ ये कहानी किसी छोटे बच्चे की है जो गाँव वालों के साथ यात्रा पर जा रहा था और उसकी माँ ने कुछ धन उसके वस्त्रों में छुपा दिया था परन्तु बच्चे ने ऐसा अवसर आने पर झूठ नहीं बोला और बता दिया.

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 19, 2012

    आपने सत्य सुना…. आदरणीय पीताम्बर जी…..

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 19, 2012

    आदरणीया मातेश्वरी….. आदरणीय पीताम्बर जी की समस्या का समाधान करने के लिए……… आपका हार्दिक धन्यवाद……

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
September 17, 2012

प्रिय नाती श्री , सस्नेह शायद इस कथा से लोगों में परिवर्तन आये. बधाई

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 19, 2012

    आदरणीय नाना श्री…….सादर प्रणाम….. आखिर आप फेसबुक से बाहर निकले तो……/// आप का कहना सत्य है……आज नहीं तो कल परिवर्तन अवश्य आएगा…….//// सादर…..

chaatak के द्वारा
September 17, 2012

ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय, लेखन से आपका ये प्रेम जानकर तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे पारसमणि तो स्वयं आपमें है|

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 19, 2012

    आदरणीय चातक जी…..सादर….. सराहना की लिए धन्यवाद……लेकिन प्रभु………….. हम ऐसे तो नहीं हैं……

akraktale के द्वारा
September 17, 2012

आदरणीय               सादर, एक सुनी हुई कहानी को पुनः स्मरण कराने का शुक्रीया. इसी के साथ पुनः याद ताजा हो गई है डाकू विक्रम जीत सिंह की.

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 19, 2012

    आपका हार्दिक धन्यवाद…….आदरणीय अशोक जी….. जी हाँ,,,ये रचना पुरानी ही है…..किसी भी ढंग से मंच पर हाजिरी तो जरूरी है…… सही कहा ना…… सादर…..

    akraktale के द्वारा
    September 19, 2012

    बिलकुल!

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 20, 2012

    धन्यवाद……….आदरणीय अशोक जी…..

nishamittal के द्वारा
September 17, 2012

बहुत सुन्दर, प्रेरक और सकारात्मक कथा.बचपन में एक कहानी पढ़ी थी जिसमें एक बच्चे ने इसी प्रकार डाकुओं के सरदार का ह्रदय परिवर्तन कर दिया था.थोडा संदर्भ भिन्न था.

    DR. PITAMBER THAKWANI के द्वारा
    September 17, 2012

    निशाजी, एवं विक्रम जीत जी,आपकी कथा को निशा जी ने सूनी हुयी बताया है ,उन्हें याद दिलवाने के लिए कहना चाहूंगा की वह है सुदर्शन की कहानी – “हार की जीत “, यह बिलकुल वैसी ही है ! खैर इससे मेरी अतिरिक्त जानकारी बढी मै आपका आभारी हूँ !आप ने सुन्दर सन्देश दे कर हमें माला माल कर दिया यह भी हमारे लिए क्या ‘पारसमणि’ से कम है? मुझे एक और उपलब्धि हासिल हुई ,मै अपने को अब ‘मंच के वरिष्ठ ब्लागर्स’ में मानूंगा, इस रचना को पद कर ,जिसका श्रेय आपको,विकर्म जीत जी को ही जाता है!ano

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 19, 2012

    आदरणीया मातेश्वरी……. आपका हार्दिक धन्यवाद…….

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 19, 2012

    आदरणीय पीताम्भर जी….. आप बड़े हैं…..आदरणीय हैं…..तो वरिष्ट भी तो हैं ही…… सादर धन्यवाद…..

    Keydren के द्वारा
    October 17, 2016

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