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दर्द-ए-मोहब्बत......

Posted On: 4 Sep, 2012 Others,मस्ती मालगाड़ी में

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alone0if[1]दर्द-ए-मोहब्बत के मारों के,
सारे सहारे डूब गए,
कल डूबी थी कश्ती अपनी,
आज किनारे डूब गए…….!

……………………………

दिल वालों की चाहत देखो,
दिल वालों की हिम्मत देखो,
दिल के सहारे चल निकले थे,
दिल के सहारे डूब गए…….!!

……………………………

कश्ती भी कुछ काम न आई,
मौत भी चाहत की न मिली,
जो आये थे पार लगाने,
साथ हमारे डूब गए…….!!!



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46 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Tessa के द्वारा
October 17, 2016

The answer of an exetrp. Good to hear from you.

yamunapathak के द्वारा
September 14, 2012

vikram जी बेहद प्रतीकात्मक aur khubsurat कविता hai.

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 14, 2012

    आदरणीया यमुना जी…… प्रशंसा के लिए हार्दिक आभार…….

renukajha के द्वारा
September 14, 2012

वाह……khubsurt alfaaz

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 14, 2012

    आप का ब्लॉग पर स्वागत है…….रेणुका जी……और हार्दिक धन्यवाद भी….

vivek bhandari के द्वारा
September 14, 2012

जितनी तारीफ की जाये कम.

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 14, 2012

    हार्दिक धन्यवाद……विवेक जी…..

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
September 13, 2012

जो आये थे पार लगाने , साथ हमारे डूब गए | विक्रमजीत सिंह जी , नमस्कार ! पंक्ति अच्छी लगी ! बधाई !

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 13, 2012

    विजय जी……सादर नमस्कार…. सराहना के लिए शुक्रिया…….

Aniket mishra के द्वारा
September 11, 2012

बहुत  बहुत सुन्दर शब्दों से संजोया है आपने विक्रम जी

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 12, 2012

    मिश्रा जी….आप का हार्दिक धन्यवाद……

seemakanwal के द्वारा
September 9, 2012

जो आये थे पर लगाने साथ हमारेगये .बहु डूब त खुबसूरत गज़ल ,हार्दिक आभार .

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 10, 2012

    आपका हार्दिक आभार…..आदरणीया सीमा जी…..

Punita Jain के द्वारा
September 7, 2012

आदरणीय विक्रमजीत जी, सुन्दर शब्दों और भावपूर्ण पंक्तियों से सजी बेहतरीन शायरी के लिए बधाई |

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 8, 2012

    आदरणीया पुनीता जी,,,,,,सादर,,,, आपको रचना अच्छी लगी…..तहे दिल से आभारी हैं आपके….. धन्यवाद….

yogi sarswat के द्वारा
September 7, 2012

दिल वालों की चाहत देखो, दिल वालों की हिम्मत देखो, दिल के सहारे चल निकले थे, दिल के सहारे डूब गए…….!! इतने गहरे शब्द ? विक्रमजीत सिंह जी बहुत सुन्दर ! पसंद आई आपकी कलाकारी !

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 7, 2012

    प्रिय मित्र योगी जी,,,,,,सादर,,,, आपको रचना पसंद आई…..तहे दिल से आभारी हैं आपके….. धन्यवाद….

ashishgonda के द्वारा
September 6, 2012

आदरणीय, सादर प्रणाम,, दर्द-ए-मोहब्बत को शब्दों में ढालना का सफल प्रयास,,,बहुत खूब,,मैंने पहली बार प्रेम पर चार पंक्तियाँ लिख रहा हूँ– “मैं प्यार करता हूँ उसे वो मुझपे मरती है, मैं इजहार न कर पाया और वो भी डरती है, यहीं तक है अभी सीमित हमारे इश्क का किस्सा, नम आँख है मेरी और वो आहें भरती है…” http://ashishgonda.jagranjunction.com/2012/09/05/%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%95-%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B8/

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 7, 2012

    आशीष जी…….अभिनन्दन…. किस से प्यार करते हो……तो उसे कहते क्यों नहीं………बरखुरदार……हम बताते हैं….उसे कहो….. ”क्या मजबूरियां हैं तुम्हारी….बताती क्यूँ नहीं….. रहता हूँ तुम्हारे पड़ोस में……आती क्यूँ नहीं…….”

    ashishgonda के द्वारा
    September 9, 2012

    मान्यवर! आपके उत्तर को पढकर दुबारा ये बताने आया हूँ की अभी ऐसा कुछ नहीं है ये सब मेरी काल्पनिकता है आगे होगा तो जरूर सूचित करूँगा……

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 9, 2012

    प्रिय आशीष जी…. आपकी सूचना का इंतज़ार रहेगा…..

rekhafbd के द्वारा
September 6, 2012

कश्ती भी कुछ काम न आई, मौत भी चाहत की न मिली, जो आये थे पार लगाने, साथ हमारे डूब गए ,अति सुंदर अभिव्यक्ति पर हार्दिक बधाई विक्रमजीत जी

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 7, 2012

    आदरणीया रेखा जी…..सादर….. आपका हार्दिक धन्यवाद……

alkargupta1 के द्वारा
September 6, 2012

सुन्दर भावाभिव्यक्ति विक्रमजीत जी

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 7, 2012

    आदरणीया अलका जी…..सादर….. आपका हार्दिक धन्यवाद….

vinitashukla के द्वारा
September 6, 2012

कुछ ही पंक्तियों में बहुत कुछ कह देने वाली सशक्त अभिव्यक्ति! बधाई विक्रमजीत जी.

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 7, 2012

    आदरणीया विनीता जी….सादर… आपका हार्दिक धन्यवाद….

D33P के द्वारा
September 5, 2012

साहिल की कोई किश्ती नहीं होती हर किश्ती का साहिल नहीं होता मोहब्बत की कोई भाषा नहीं होती हर दर्द भी दर्द-ए-मोहब्बत नहीं होता

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 12, 2012

    आदरणीया दीप्ति जी….. सुन्दर शब्दों में दी हुई आपकी प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद…..

nishamittal के द्वारा
September 5, 2012

विक्रम जी सुन्दर रचना कश्ती भी कुछ काम न आई, मौत भी चाहत की न मिली, जो आये थे पार लगाने, साथ हमारे डूब गए…….!!!

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 7, 2012

    आदरणीया मातेश्वरी…..सादर… रचना की प्रशंसा के लिए……आपका हार्दिक धन्यवाद….

akraktale के द्वारा
September 5, 2012

विक्रमजीत जी भाई                       नमस्कार, दर्द-ए-मोहब्बत के मारों के, सारे सहारे डूब गए, कल डूबी थी कश्ती अपनी, आज किनारे डूब गए…….!  वाह! बहुत उम्दा, दर्द को गीत में पिरोने के प्रयास पर  हार्दिक बधाई.

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 7, 2012

    आदरणीय अशोक जी…..सादर….. आपको रचना अच्छी लगी….अहोभाग्य….. आपका हार्दिक धन्यवाद….

dineshaastik के द्वारा
September 5, 2012

कश्ती भी कुछ काम न आई, मौत भी चाहत की न मिली, जो आये थे पार लगाने, साथ हमारे डूब गए…….!!! भाई विक्रम जी, सुन्दर अभिव्यक्ति की प्रस्तुति के लिये बधाई….

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 7, 2012

    आपका हार्दिक धन्यवाद…. आदरणीय दिनेश जी……सादर….

annurag sharma(Administrator) के द्वारा
September 4, 2012

दिल वालों की चाहत देखो, दिल वालों की हिम्मत देखो, दिल के सहारे चल निकले थे, दिल के सहारे डूब गए… बहुत ही सुंदर अल्फाज ,,,,,

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 7, 2012

    आदरणीय अनुराग जी……सादर…. आपका हार्दिक धन्यवाद….

अजय यादव के द्वारा
September 4, 2012

सुंदर

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 7, 2012

    आपका हार्दिक धन्यवाद…. अजय जी……सादर…..

jlsingh के द्वारा
September 4, 2012

अपनों ने ही सदा दिए हमें घाव| किनारों ने ही डुबोई मरी नाव| कश्ती भी कुछ काम न आई, मौत भी चाहत की न मिली, जो आये थे पार लगाने, साथ हमारे डूब गए…….!!! इरशाद, इरशाद!!! कुछ तो बात है विक्रम जी बाद में बताइयेगा तबतक डुबकी लगाकर आनंद लीजिये!

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 6, 2012

    आपने तो मूंह की बात छीन ली…..प्रभु….. ”दिल का ग़मों से रिश्ता क्या है….. इश्क का हासिल आंसू क्यूँ….. हम को कितना ज़हर पिलाया इन बे-दर्द सवालों ने…… रस्ते भर रो-रो के हम से पूछा पाँव के छालों ने…. बस्ती कितनी दूर बसा ली….दिल में बसने वालों ने…..”

Himanshu Nirbhay के द्वारा
September 4, 2012

अपनों ने ही सदा दिए हमें घाव| किनारों ने ही डुबोई मरी नाव| बहुत सुन्दर विक्रम ji, अतिसुन्दर …..

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 7, 2012

    आपका हार्दिक धन्यवाद…. आदरणीय निर्भय जी…..

manoranjanthakur के द्वारा
September 4, 2012

कल और आयेंगे पार लगाने वाले बहुत खूब सुंदर भाव में लिखी कविता बधाई

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 7, 2012

    आदरणीय मनोरंजन जी….. आपका हार्दिक धन्यवाद….


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