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आज भी प्रासंगिक हैं चाणक्य-नीतियाँ........

Posted On: 27 Aug, 2012 Others में

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chanakya[1]इंसान के जीवन में अनेक प्रकार के मोड़ आया करते हैं, उसे विभिन्न पड़ावों से हो कर गुजरना पड़ता है, शिक्षा प्राप्त करने की अवधि में उसका अनेक शिक्षकों से पाला पड़ता है. जो विभिन्न विषयों में उसका मार्गदर्शन करते हैं. इतिहास के पन्ने पलटने पर पता चलता है, की इस महान देश में अनेक विद्वान्, चिन्तक, मनीषी हुए हैं जिन्होंने मानव जीवन की आचार सहिंताओं का निर्माण किया, समय-समय पर मानव जीवन का मार्गदर्शन करते हुए, सटीक व्याखाएं करते रहे हैं. हमेशा मानव को करणी/अकरणी का बोध कराते रहे हैं.
इन्हीं चिंतकों में आचार्य चाणक्य, एक महान चिन्तक/विचारक हुए हैं, उन्हें ‘कौटिल्य’ भी कहा जाता है, ‘सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य’ के गुरु और प्रधानमंत्री, इन्हें ‘चाणक्य नीति’ और ‘अर्थशास्त्र’ का रचयिता कहा जाता है.
आज के राजनीतिक और अधिकारी वर्ग के लिए चाणक्य नीति को सम्पूर्ण मार्गदर्शक ग्रंथ कहा जा सकता है.
कहा जाता है, महामंत्री चाणक्य अपने आवास में दो-दो दीपक रखा करते थे, जब वे राष्ट्रीय कार्य करते थे, तो राजकीय दीपक जलाते थे, जब उन्हें अपने निजी कार्य करना होता था, तब वे अपना निजी दीपक जलाया करते थे,

सामाजिक व्यव्हार को लेकर आचार्य चाणक्य ने कुछ सूक्तियों की रचना की है, जैसे, ”पाँव धोने के बाद बचे हुए पानी को कभी भी नहीं पीना चाहिए, इसे पीना पाप होता है, इसी प्रकार, आग, गुरु, ब्राहमण, गाय, कुंवारी कन्या, वृद्ध और बच्चे को कभी भी पाँव से नहीं छूना चाहिए, ऐसा करने से पाप लगता है”
आज का इंसान केवल ‘आज’ का ही सोचा करता है, जबकि सच्चाई ये है कि ‘आज’ की नींव ‘अतीत’ पर ही टिकी हुई होती है, उसे भुलाया नहीं जा सकता, हम ‘आज’ जो कुछ भी करते हैं, उसका फल हमें यहीं, इसी जन्म में मिल जाया करता है, आचार्य चाणक्य ने इसकी व्याख्या गाय और बछड़े का उदाहरण देकर की है, ”जिस प्रकार हजारों गायों के बीच बछड़ा अपनी माँ के पास ही आया करता है, ठीक उसी प्रकार हमें भी अपने किये हुए कर्मों के फल यहीं भुगतने होते हैं.”
आचार्य चाणक्य ने सामाजिक सरोकारों को व्यवस्थित कर सामाजिकों का मार्गदर्शन किया है, संतान के प्रति पिता के क्या-क्या कर्त्तव्य हुआ करते हैं, इसका वर्णन उन्होंने इस प्रकार किया है, ”पांच वर्ष की अवस्था तक संतान का लालन-पालन करना चाहिए, दस वर्ष की उम्र तक उसे प्रताड़ित करते रहना चाहिए, उसके बाद सोलह वर्ष की आयु के पश्चात उसके साथ मित्रवत व्यवहार करना चाहिए” वैसे भी कहा जाता है, जब बाप का जूता, बेटे के पाँव में आ जाये, तो उसे मित्र ही समझना चाहिए.
पूत-कपूत को लेकर आचार्य चाणक्य इस प्रकार स्पष्ट करते हैं, ”सुपुत्र उस चंद्रमा के समान है, जो अपने अकेले के दम से गहन काली रात में भी उजाला कर देता है, इसके विपरीत कुपुत्र उस सूखे वृक्ष के समान है जो स्वयं तो जलता ही है, सारे वन को भी जलाकर ख़ाक कर देता है”.
मनुष्य के वास्तविक मित्र कौन से हैं, इस पर भी आचार्य चाणक्य ने अपने विचार प्रकट किये हैं, ”प्रवासकाल में विद्या (ज्ञान) मित्र होती है, गृहस्थ जीवन में पत्नी, रोगी के लिए औषधि, और मृत्यु के बाद धर्म ही मनुष्य का परम मित्र होता है”
आचार्य चाणक्य ने विद्यार्थियों के लिए भी कुछ कहा है, ”सुख की कामना करने वाले को विद्या त्याग देनी चाहिए, क्योंकि सुख चाहने वालो को विद्या नहीं मिला करती और विद्या चाहने वालों को सुख नहीं मिला करता”
आचार्य चाणक्य का मानना है की मानव सदा से ही प्रक्रति पुत्र रहा है, अगर मनुष्य प्राकृतिक जीनव व्यतीत करता है, तो ज्यादा सुखी रहता है, आचार्य चाणक्य ने पशु-पक्षियों से सीख लेने की मानव को सलाह दी है, उन्होंने शेर से एक, बगुले से एक, मुर्गे से चार, कौए से पांच, कुत्ते से चार बातों की शिक्षा लेने को कहा है,
”शेर अपना कार्य पूरी शक्ति से सम्पन्न किया करता है,
बगुले में मन की एकाग्रता हुआ करती है,
मुर्गे से जागना, लड़ना, भागना और स्वयं झपट कर खाना सीखा जा सकता है,
कौवा हमेशा छिपकर सहवास करता है,, वह किसी पर विश्वास नहीं करता, उसमें संग्रह की प्रवर्ति होती है, वह हर समय सावधान रहता है, संकट पड़ने पर वह अपने साथियों को एकत्रित कर लेता है.
कुत्ता थोड़े में ही संतोष कर लेता है, गहरी नींद में भी वह सतर्क रहता है, वह वीर और स्वामिभक्त होता है.”
मनुष्य बुदापे को लेकर भी चिंतित रहता है, ये कब आता है, या क्या लक्षण हैं इसके, आचार्य चाणक्य इसे इस प्रकार स्पष्ट किया है, ”राह नापता हुआ मनुष्य, बंधा हुआ घोडा, सहवास वर्जित स्त्री तथा वस्त्रों का सूखना ही बुढ़ापे का अहसास करते हैं.”
शुद्ध-अशुद्ध के बारे में आचार्य चाणक्य ने कहा है, ” कांसा राख से, तांबा अम्ल (खट्टा) से, नारी रजस्वला होने से, नदी अपने ही वेग से शुब्ध हुआ करते हैं” हमेश भूमिगत जल शुद्ध होता है, पतिव्रता स्त्री शुद्ध होती है, जो ब्राह्मण संतुष्ट रहता है, वो शुद्ध होता है,”
व्यक्तिगत शुद्धता के लिए उन्होंने कहा है,”मन वचन को नियंत्रत रखना, इन्द्रियों का निग्रह करना, सभी प्राणियों के प्रति दया करना, दूसरों का उपकार करना” ही सर्व शुद्धता होती है.
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आचार्य चाणक्य ने सामाजिक सरोकारों को अनेक प्रकार से विश्लेषित किया है. ये तो चंद उदाहरण हैं, उनकी सूक्तियों का दायरा काफी वृस्तित है,
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पाठकों से क्षमा चाहते हैं, क्योंकि आचार्य चाणक्य की सूक्तियां संस्कृत में होने की वजह से टाइपिंग में प्रॉब्लम आ रही थी, सो हमने, उनको सिर्फ हिंदी सरलार्थ में ही टाइप किया है, क्षमाप्रार्थी हैं,
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44 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Lola के द्वारा
October 17, 2016

Arceltis like this make life so much simpler.

rajpalsingh के द्वारा
September 1, 2012

vikramjit jee, bahut vadhiya jaankari di hai aapne

    vikramjitsingh के द्वारा
    September 2, 2012

    राजपाल जी….. तुहाडा बहुत-बहुत शुक्रिया……

    Beatrice के द्वारा
    October 17, 2016

    Kosta den nye griandsen ekstra masse peng også, sidan det er mindre i den? Kosta den nye grandisen ekstra masse peng også, sidan det er mindre i den?

ajay kumar pandey के द्वारा
August 30, 2012

आदरणीय विक्रमजीत जी नमन आपने चाणक्य निति को बहुत ही सरल शब्दों में समझाया है पर आपने जो इसका सूत्र होता है जिसमें राजनीती में कैसे चाल चलें यह वर्णन आता है चाणक्य सूत्र इसका नाम है फिर भी आपने चाणक्य नीति को बड़े ही सुन्दर शब्दों में समझाया है मुझे भी यह अच्छा लगा पर मैंने चाणक्य सूत्र भी पढ़ा है मुझे यह अच्छा लगा बेहद ज्ञानपरक और नीतिपरक आलेख धन्यवाद अजय कुमार पाण्डेय

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 30, 2012

    प्रिय अजय जी…..नमस्कार…. प्रशंसा के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद……..

jlsingh के द्वारा
August 30, 2012

आदरणीय विक्रम जी, नमस्कार! चाणक्य के बहाने आपने बहुत सारी जानकारियां उपलब्ध कराई जो आज भी प्रासंगिक है. एक बात मैं आपको याद दिला देता हूँ, संभवत: आपको मालूम भी ही हो क्योंकि आपने चाणक्य को विस्तार से पढ़ा है. उन्होंने कहा था – “मांगने पर दो अरि(दुश्मन) को प्रेम!” आपके इस सारगर्भित आलेख के लिए बधाई! इस बार बहुत सारे आलेख लीक से हटकर आए हैं. विभिन्न कार्यों बे ब्यस्त रहने के कारण थोडा विलंब से इस लेख पर आए हैं आशा है आप अन्यथा न लेंगे! आभार सहित!

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 30, 2012

    आदरणीय जवाहर जी……सादर नमस्कार…. अन्यथा कह कर आप क्यों हमें शर्मिंदा करते हैं…..आप आये यही बहुत है हमारे लिए….. आपका हार्दिक धन्यवाद…….

अजय यादव के द्वारा
August 29, 2012

प्रणाम सर जी | ज्ञान परक जानकारी|शुक्रिया| हमारे जीवन में जितनी जागरूकता ( होश /स्व की अनुभूति ) बढती जायेगी और बेहोशी घटती जायेगी , उसी अनुपात में , हमारे जीवन में त्रुटि , हिंसा , लालच ,कदाचार और नाना प्रकार के दुर्गुण कम होते जायेंगे और आत्म प्रसाद मिलेगा , आत्म प्रसाद से ,सुख , सम्पन्नता ,संतोष ,आनंद उपलब्ध होजायेगा ….( प्रसाद युक्त होने से छूटते सब दुःख हैं , होती प्रस न्न चेता की बुद्धि सुस्थिर शीघ्र ही > गीता में श्री कृष्ण )….. ONE WHO IS FULLY AWARE , CAN’T COMMIT A MISTAKE ….

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 30, 2012

    नमस्कार…अजय जी…. बहुत अच्छी जानकारी दी आपने…. आपका हार्दिक धन्यवाद…….

alkargupta1 के द्वारा
August 29, 2012

ज्ञानवर्धन हेतु अति महत्त्वपूर्ण आलेख विक्रमजीत जी

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 30, 2012

    आपका हार्दिक धन्यवाद……. आदरणीया अलका जी….

phoolsingh के द्वारा
August 29, 2012

विक्रमजीत जी सादर प्रणाम अत्यंत सुंदर शिक्षाप्रद…..आलेख… फूल सिंह

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 30, 2012

    आदरणीय फूल सिंह जी…..सादर प्रणाम… आपका हार्दिक धन्यवाद…….

rekhafbd के द्वारा
August 29, 2012

विक्रम जीत जी ,बहुत ही खूबसूरती से आपने आचार्य चाणक्य की नीतियों का वर्णन किया ,ज्ञानवर्धक आलेख के लिए आपका आभार

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 30, 2012

    आदरणीया रेखा जी….सादर…. आपका हार्दिक धन्यवाद…….

akraktale के द्वारा
August 28, 2012

विक्रमजीत जी                 सादर,  सच कहा है आपने चाणक्य दूरद्रष्टा थे और तभी उनकी नीतियां आज भी हमें सही लगती हैं. इतनी महत्वपूर्ण जानकारिया देने के लिए आपका आभार.

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 30, 2012

    आदरणीय अशोक जी….सादर…. आपका हार्दिक धन्यवाद…….

bebakvichar, KP Singh (Bhind) के द्वारा
August 28, 2012

विक्रमजी आपने यह उचित लेख लिखा है। चाणक्य की नीतियां न केवल शासन की उचित पद्धति बल्कि सामाजिक सरोकारों से भी जुड़ी हैं और यह सदैव प्रभावी रहेंगी। अत्यंत सुंदर शिक्षाप्रद…..आलेख…

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 30, 2012

    आदरणीय के पी सिंह जी…..सादर…. आपका हार्दिक धन्यवाद…….

अन्जानी- अनिल के द्वारा
August 28, 2012

सादर प्रणाम! आप अच्छे होकर एक बार फिर हम लोगों के बीच आये……….यह बहुत ही हर्ष का विषय है …………..आपकी आप पर विजय की मुबारक बाद……………………………!

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 30, 2012

    प्रणाम अनिल भाई….. असली हर्ष का विषय तो तब बनेगा जब आप हमारे साथ आओगे….. हार्दिक शुभकामनाएं ……

Mohinder Kumar के द्वारा
August 28, 2012

विक्रम जी, चाणक्य नीति का कोई भी तोड नहीं है….परन्तु कोई यह न समझ ले कि सोनिया या मनमोहन जी इसका इस्तेमाल कर रहे हैं…. यदि कर रहे होते तो आज कोई उनके खिलाफ़ बोलने की जुर्रत न करता. हां ये मंत्र श्रीमति इन्दिरागांधी जरूर जानती थी और उन्होंने अपना शासन बखूबी निभाया. गूढ मंथन से उपजे लेख के लिये बधाई.

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 30, 2012

    आदरणीय मोहिंदर जी…..सादर….. आप का कहना एक दम सत्य है……लेकिन ये बात इन लोगों तक कैसे पहुंचेगी…..??? सादर….धन्यवाद….

dineshaastik के द्वारा
August 28, 2012

भाई् विक्रम जी, सहमत हूँ आपसे। विश्व की अधिकाँश शासन व्यस्थाओं में चाणक्य की नीतियों का कहीं न कही दिग्दर्शन आवश्य हो जायेगा। चाणक्य की नीतियाँ सफल जीवन के लिये अत्यंत आवश्यक हैं।

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 30, 2012

    सहमती के लिए हार्दिक आभार….. सादर……..दिनेश जी……

    Jailen के द्वारा
    October 17, 2016

    Bebert et Vincent, revendre Bizpowa à Yaya, mdr c’est vraiment dans la politique de business d&71;8#2oxiweb de revendre quoi que ce soit, surtout quand ca cartonne sec !Ca sent le poisson d’avril à 10 km ^^

D33P के द्वारा
August 27, 2012

चाणक्य नीतिया आज भी सार्थक है और उन्हें अपने जीवन में वरण कर जीवन को सार्थक और सरल बनाया जा सकता है !बहुत उम्दा लेख, बधाई

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 30, 2012

    आदरणीया दीप्ति जी……सादर…. आपका हार्दिक धन्यवाद…….

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
August 27, 2012

आदरणीय नाती श्री जी, सस्नेह. ज्ञानवर्धक लेख प्रस्तुत करने पर आपको बधाई.

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 30, 2012

    आदरनिये नाना श्री……सादर…. ऐसे ही स्नेह बनाये रखिये……

    Jahlin के द्वारा
    October 17, 2016

    Cheesy Potatoes20 oz package of hashbrowns2 cups shredded cheddar cheese1 can cream of potato soup1/4 cup chopped onions1/4 cup melted butter3/4 cup sour cream1 1/2 cup crushed corn flakes2 tbsp melted buetPrertheat oven to 350. Spray a baking pan with nonstick spray. Combine first 6 ingredients in a large bowl. Mix well. Transfer mixture to prepared pan. Combine corn flakes and 2 tbsp melted butter in a small bowl. Spread topping onto mixture. Bake for 45 minutes.

nishamittal के द्वारा
August 27, 2012

विक्रम जी चाणक्य जैसे राष्ट्रभक्त मनीषियों की ही आज हमारे देश को आवश्यकता है,जिनका स्वार्थ केवल राष्ट्र हित था.

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 30, 2012

    मातेश्वरी…..सादर प्रणाम…. आपका कहना सत्य है…..आजकल के नेताओं में ये गुण कहाँ…..???

manoranjanthakur के द्वारा
August 27, 2012

अब आदमी को इन्ही शेर मुर्गा व बगुले से सीख लेने की जरूरत है इंसान कहा जा रहा है जरा सोचे तो सही बहुत बधाई

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 30, 2012

    आदरणीय मनोरंजन जी…..सादर….. इंसान तो अब पशु कहलाने के काबिल भी नहीं रहा…..अपनों को ही नोच-नोच कर खा रहा है…. सादर……धन्यवाद…..

annurag sharma(Administrator) के द्वारा
August 27, 2012

100% सच लिखा है आपने ,,आज इसी नीति की जरुरत है साहब बहुत अच्छा लिखा है ,,,,,,,,,,

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 30, 2012

    आदरणीय अनुराग जी….सादर….. आपका हार्दिक धन्यवाद……


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