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सुन्दर-कांड पाठ का रहस्य.........

Posted On: 17 Aug, 2012 Others में

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कुछ न कुछ तो सत्य है ही साधना में जो इस धरती के करोड़ों लोग इस के मार्ग पर चल रहे हैं, उन्हें कुछ न कुछ तो मिलता ही है जो तमाम लोग अपना समय लगा रहे हैं.
सत्य ही कहा गया है कि साधना में शक्ति तो है ही, लेकिन इस शक्ति का अनुभव मात्र साधक ही कर सकता है. शव साधना करने वाला ही शव साधना से प्राप्त शक्ति के बारे में जान सकता है, सप्तशती का पाठ करने वाला ही उस शक्ति के बारे में जान सकता है. अगर कोई नया खिलाडी बिना गुरु के मार्गदर्शन के शव साधना करने लगे या मारण प्रयोग करने लगे तो हानि तो उठाएगा ही, इसमें कतई संशय की आवश्यकता नहीं.
यह घटना भी एक पूर्वकालिक पेशेवर पंडित जी से सम्बन्धित है. उन्होंने अपनी गृहस्थी का पालन/पोषण/पढाई-लिखाई/बच्चों के शादी/ब्याह सभी इसी पंडताई से ही कर लिया.
एक बार एक सेठ के लड़के ने हत्या के आरोप में जिला न्यायालय से फांसी की सजा पाई. सेठ जी रोते कल्पते पंडित जी की शरण में, शायद उनका लड़का निर्दोष था, लेकिन दुर्भाग्यवश उस लड़के को सजा हो गयी, सेठ जी पंडित जी के पैर पकड़ कर फफक पड़े.
पंडित जी ने सेठ जी से लड़के की जन्मकुंडली मंगवाई, अध्ययन किया, अपनी संतुष्टि की और सेठ जी के पुत्र को बचाने हेतु अनुष्ठान करने का आश्वासन दिया.
जिस वक़्त ये बातें हो रहीं थीं, उस वक़्त पंडित जी का निवास स्थान कच्चा था, छप्पर पड़ा हुआ था, यकायक सेठ जी की नज़र पड़ी तो सेठ जी कह उठे, महाराज मेरा पुत्र बरी हो गया तो आपका मकान पक्का बनवा दूंगा. पंडित जी ने कहा, मेरे बस का कुछ नहीं, मैं तो मात्र उस मातेश्वरी से प्रार्थना करूंगा. हाँ, यदि आपका पुत्र वाकई निर्दोष है, तो आपका पुत्र एक माह में घर आ जायेगा, आप जा कर इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील कीजिये.
(यह सत्य घटना 1970 की है, घटना का स्थान और पात्रों के नाम देना यहाँ उचित नहीं है)
सेठ जी चले गए, अपील की हाईकोर्ट में, सेठ जी का मुनीम नित्य ही अनुष्ठान की सामग्री, घी, जों, इत्यादि पंडित जी के घर आकर दे जाता. पंडित जी के आवास और सेठ जी की हवेली में 30 किमी कि दूरी थी. पंडित जी पूरे मनोयोग से अनुष्ठान में जुट गए. 23 दिन गुजर गए.
प्रक्रति का चमत्कार, 30वें दिन शाम को लगभग 6 बजे सेठ जी को उनके वकील का इलाहाबाद से फ़ोन आया, सेठ जी के पुत्र को हाईकोर्ट से जमानत पर रिहा करने का आदेश मिल गया था, अदालत का आदेश लेकर आदमी इलाहाबाद से चल चुका था. सेठ जी अभिभूत भाव से उसी रात एक ट्रक सीमेंट लेकर पंडित जी के घर को चल पड़े. सेठ जी का पुत्र कुछ माह बाद बरी हो गया. इधर पंडित जी का मकान तैयार हो गया था.
इन्ही पंडित जी का युवा पुत्र लक्ष्मीकांत बी.एस.सी का छात्र था, मेडिकल परीक्षा की तैयारी कर रहा था. एक दिन लक्ष्मीकांत अपने पिता से कह बैठा, पापा आप यह नाटक कब तक करते रहोगे, जनता को कब तक मूर्ख बनाते रहेंगे, अब आप मुझे कोई चमत्कार दिखाएँ तब मैं जानू, मैं विज्ञान का छात्र हूँ, यह सब धोखा है, नहीं तो आप यह सब कुछ छोड़ दीजिये.
पिता अपने पुत्र के मुंह से ऐसी बातें सुनकर सकते में आ गए. जिस पंडताई से सारी गृहस्थी चला रहा हूँ, लड़का उसके बारे में ही यह बातें बोल रहा है, पिता ने हस कर टाल दिया, अरे जा पढाई कर, क्या करेगा चमत्कार देख कर, मेरे पास कोई जादू नहीं है, जो चमत्कार दिखा सकूं.
युवा पुत्र जिद पर आ गया था, या तो चमत्कार दिखाइए या फिर ये पूजा-पाठ छोड़ दीजिये, पंडित जी पुत्र की जिद के आगे हार गए, कारण था पुत्र प्रेम. किसी भी अनिष्ट से बचाने का उत्तरदायित्व भी था. पुत्र को कुछ न कुछ अनुभव तो कराना ही था.
रजोगुणी, तमोगुणी मार्ग से चमत्कार जल्दी होने की सम्भावना थी, लेकिन इस मार्ग से अनिष्ट होने की सम्भावना भी अधिक थी. कहा, ठीक है, मंगलवार को एक काम बताऊँगा, ध्यान से करना, अपने आप ही सब कुछ पता चल जायेगा, लेकिन हाँ, यदि कुछ अनुभव हो, और तेरे ज्ञान की कसौटी पर खरा उतरे तो जीवन भर कभी ऐसी बात मत करना, और साधना का मार्ग कभी मत छोड़ना, जब तक जीवन रहे, नित्य कुछ न कुछ साधना अवश्य करना. पुत्र ने स्वीकार कर लिया,
मंगलवार आ गया, पिता ने पुत्र को एक साधारण सा काम बता दिया, नित्य रात्रि 11 बजे सरसों के तेल का दीपक जलाकर हनुमान जी की प्रतिमा के सामने रखकर दक्षिण दिशा की तरफ मुंह करके रामचरितमानस के सुन्दर कांड का पाठ करना, पूरा सुन्दर कांड नित्य समाप्त करना, कम से कम 11 दिन तक नहा धोकर स्वस्छ वस्त्र पहन कर. चाहे कुछ भी हो जाये, आसन से उठकर भागना मत.
लक्ष्मीकांत ने अनुष्ठान प्राम्भ कर दिया. पिता ने अपनी खटिया भी उसी कमरे में थोड़ी दूर डाल ली. पुत्र के आसन के चारों और अभिमंत्रित जल से रक्षा कवच बना दिया. अपनी रुद्राक्ष की माला भी पुत्र के गले में डाल दी.
पांच दिन गुजर गए, पाठ सस्वर चलता रहा, पिता खाट पर लेटे पुत्र की रक्षा करते, सो जाते.
छठे दिन, लगभग रात के 12 बजे पुत्र की चीख सुनाई दी, पंडित जी उठकर भागे, पुत्र के कंधे पर हाथ रखा, बहुत सहमा हुआ था लक्ष्मीकांत, पाठ पूरा करके उठा तो पिता को बताया, “ऐसा लग रहा था जैसे मेरे पास एक वानर बैठा रामायण सुन रहा है, उसकी आँखें बंद थीं, और हाथ जुड़े हुए थे. ये शायद मेरा भ्रम था या कुछ और.” कोई बात नहीं, पंडित जी मुस्करा दिए.
उसके बाद लगभग रोज रात को लक्ष्मीकांत डर कर चीखता, पिता फिर उठकर भागते. रामायण का पाठ पूरा हुआ. पूरे 11 दिन लक्ष्मीकांत पाठ करता रहा. उसके बाद अपने पिता के पाँव पकड़ लिए, और क्षमा मांगी.
लक्ष्मीकान्त ने खुद ये घटना स्वामी जी को बताई, कहा छठे दिन से एक वानर आकृति कमरे में मेरे पास आकर बैठ जाती, और पाठ पूर्ण होने तक मैं उसे स्पष्ट देखता. पाठ पूर्ण होने पर आरती करने के बाद वो आक्रति गायब हो जाती.
लक्ष्मीकांत ने आगे कहा, स्वामी जी, उस बंद कमरे में, किसी का भी घुस पाना असंभव है, तो वो वानर कहाँ से आता था, पहले तो मुझे डर लगा था, बाद में श्रद्धा-विश्वास पूर्वक मैं भी उस वानर प्रतिमा को प्रणाम करने लगा था.
कुल मिला कर इस अदभुत घटना ने, या ये कहिये लक्ष्मीकांत के इस अनुभव ने जीवन में सोचने का ढंग ही बदल दिया था उसका. बाद में पक्का धरम-भीरु हो गया, तंत्र का पारंगत हो गया, अच्छा मन्त्र विज्ञानी हो गया.
लेकिन हाँ, डॉक्टर तो नहीं बन सका, लेकिन एल.एल.बी. करके आज इलाहाबाद हाईकोर्ट में वकालत कर रहा है…
लेकिन आज भी हैरान है, कि आखिर उस वानर आकृति का रहस्य क्या था…….?



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73 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jalene के द्वारा
October 17, 2016

Areitlcs like this just make me want to visit your website even more.

snsharmaji के द्वारा
August 29, 2012

  दोस्त ये मन का खेल  है इस से अ्धिक कुछ नही  पूजाा से मन एकाग्र होता है बाकी सब अन्ध विसवास हैभागवत पुराण का स्कंध 4 अध्याय11 श्लोक17 व राम चरित मानसस की शुुरू की220 चौपाई पढो बाकी कथा वर्णन है मानो या न मानो आपकी मरजी अगर हनुमानमे इतनी ताकत थी तो मुसलिम  हमलावर  क्यो आए क्यो इतनेदिन से हिन्दू गुलाम  हैं हनुमान  ने क्यो नही मारे  क्यो रोज  हिन्दू मारे जाते हैं   अपने देस मे ही बेघर कर दिये हनुमान को मुसलमान तो मानते नही  सिर्फ हिन्दू मानते हैं किस सटेज पर  रक्षा कीी सोचोो जरा क्यो कोई देवता ऱक्षा नही करतासंकट मोचन मन्दिर पर हमला क्यो हनुमान  अपने मन्दिर की रक्षा नही कर सका इसी अन्धविसवास ने गुलाम बनवाया पुन  हिन्दुओ मे 33 करोड देवता एक अरब हिन्दू एक देवता के हिस्से  तीन हिन्दू वह देवता तीन हिन्दू का कष्ट दूर नही कर सकता उल्टा हमे उनके घर बनवाने  पूपडते हैं व उनकी रक्षा करनी पडती है

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 29, 2012

    आदरणीय शर्मा जी…..सादर…. आपका हमारे ब्लॉग पर स्वागत है…..आपके मन के बोझ को हम समझ सकते हैं…….आप से सिर्फ एक ही बात कहना चाहेंगे…….अगर आपने गीता पढ़ी होती तो आप ये सवाल ही ना करते…..अब आप ये मत कहना कि गीता भी एक ढकोंसला है, वो कलयुग का ग्रन्थ है….और आज भी हर हिन्दू परिवार में मरते हुए इंसान को गीता का पाठ ही सुनाया जाता है…..खासकर गीता का 18वां अध्याय…..गीता में ये स्पष्ट लिखा हुआ है…”जैसा कर्म करेगा वैसा फल देगा भगवान्….” अगर कर्मों+नियति का लेखा-जोखा ना होता तो भगवान राम को 14 वर्ष का बनवास क्यों झेलना पड़ता….??? उनके साथ भी तो हनुमान थे…..फिर ऐसा क्या हुआ….??? जो उन को इतने कष्ट उठाने पड़े……??? क्या कहेंगे आप इस पर…..??? और एक बात……33 करोड़ देवता क्या करेंगे…….??? जब माना जाता है कि भगवान तो इंसान के अन्दर ही होता है…तो बाहर क्या है….??? आपने वो बात भी सुनी होगी….”वो खेत में मिलेगा….खलिहान में मिलेगा…..भगवान तो ऐ बन्दे…….इंसान में मिलेगा…….” तो गिला किस से प्रभु……हर इंसान अपने कर्मों का फल भुगत रहा है……..और ये सदा चलता रहा है….और चलता रहेगा…….और एक बात…..हनुमान जी को मुसलमान क्यों नहीं मानते….तो ना माने..क्या फर्क पड़ता है….हिन्दू और सिक्ख तो मानते हैं….(हम भी सिक्ख हैं और पंजाब से हैं…) और आप तो खुद हिन्दू हो…..क्या आपको नहीं पता…एक मात्र अमर देवता हैं हनुमान जी……कभी….जिंदगी में….”श्री सालासर धाम या श्री मेहंदीपुर धाम (राजस्थान) में जाकर देखिये….आँखें ना खुल जाएँ आपकी तो फिर कहियेगा…..??? साक्षात् रूप में विराजमान मिलेंगे आपको हनुमान जी…..लेकिन भक्तों के दुःख दूर करने के लिए……किसी से लड़ने के लिए नहीं……. उम्मीद है…आपकी शंका का समाधान हो गया होगा…….. समालोचक प्रतिक्रिया के लिए आप का हार्दिक धन्यवाद….सादर शर्मा जी…….

pitamberthakwani के द्वारा
August 25, 2012

कहा जाता है की विश्वास है तो पत्थर में भगवान्, नहीं तोपत्थर ही है.इस प्रकार की बातों को कहा जाता है की ये सब अंत हीन बहस की हैं!अपनें अपने विश्वास की बात है,आप अपने विश्वास के साथ चलिए और हम अपने विश्वास के साथ!

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 26, 2012

    आदरणीय पीताम्बर जी…..सादर….. आपने सत्य कहा…..अपने-अपने विश्वास की बात है,,,,,,,, आने और प्रतिक्रिया देने के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद…..

    Polly के द्वारा
    October 17, 2016

    Free neutrons have a mean free lifetime of around 15 minutes. Yet free neutrons are observed entering the atphrmoese, and these were produced in supernova explosions in galaxies millions of light years away. How is this possible?

nikhil के द्वारा
August 25, 2012

namaskar sir, aapki post padhi padh kar acha lga mujhe vishwas ki ye sab sachi baat hai.aap mujhe mujhe koi aisa upay bataiye jisse mere sabhi kaam sidh ho sake.mere kaam kabhi pure nhi hote rukawate bahut aati hai..

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 26, 2012

    आदरणीय निखिल जी….सादर नमस्कार… आत्मविश्वास और दृढ इरादा ही आदमी को प्रगति की राह पर ले जाता है…….भगवान तो निमित्त मात्र हैं……दूसरे शब्दों में कहा जाये तो जो अपनी मदद खुद करते हैं……भगवान् भी उनकी मदद करते हैं….. आपका हार्दिक धन्यवाद…..

शिवेंद्र मोहन सिंह के द्वारा
August 23, 2012

ये रचना पहले भी JJ पर पढ़ चुका हूँ. सेम टू सेम … पता नहीं किसकी थी? कहीं ये कॉपी पेस्ट तो नहीं?

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 23, 2012

    आदरणीय शिवेंदर जी……सादर…. आपने सत्य कहा……..ये रचना पहले भी इसी मंच पर हमारी ही थी…….किसी वजह से पुरानी सभी पोस्ट्स डिलीट करनी पड़ीं थीं…….इसलिए नए सिरे से पुरानी पोस्ट को ही अपग्रेड किया है…….. आभारी हैं आपके……

satya sheel agrawal के द्वारा
August 23, 2012

विक्रमजीत जी ,साधना आराधना सब मानव कल्पना की देन हैं इन तथ्यों एवं मान्यतों में कोई सच्चाई नही है. हाँ एक बात अवश्य कही जा सकती है जो लोग साधना ,आराधना और धार्मिक आचरण में विश्वास करते हैं,उन्हें मानसिक सह्नित अवश्य मिलती है. जैसे किसी भी व्यक्ति को नशा करा दिया जाय तो वह सभी दुखों को लगभग भूल जाता है.इश्वर की कल्पना सिर्फ कल्पना ही है जिसे समाज को व्यवस्थित करने का माध्यम बनाया गया.भूत प्रेत जैसे डर हमारे मन के विकार हैं, जब भी हम मानसिक रूप से कमजोर होते है इस प्रकार के डर हमारे मन पर हावी होने लगते हैं.

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 23, 2012

    आदरणीय सत्यशील जी….सादर….. आपकी बातों में सच्चाई का पुट है……लेकिन अगर यही बात उस इंसान से की जाये जो अकेला घनघोर जंगल में रात बिताने को मजबूर हो……..और तो और…..हर मुश्किल में आदमी के मूंह से ‘हे राम’ ही क्यों निकलता है…..??? प्रतिक्रिया के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद…..

Nilchand R. Mahamalla के द्वारा
August 22, 2012

यह सत्य घटना होगी यह मेरा विस्वास है

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 22, 2012

    आदरणीय महोदय….. आपने बिलकुल सटीक अवलोकन किया है…ये 1970 में घटित सत्य घटना ही है…… हार्दिक धन्यवाद……

paramjitsingh के द्वारा
August 22, 2012

vikramjit ji, sat sri akal, te naal hi jai bajrangbali

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 22, 2012

    परमजीत जी…सत श्रीअकाल….. और जय बजरंगबली……

vasudev tripathi के द्वारा
August 21, 2012

जो जड़ के स्तर तक बुद्धिजीवी हो चुके हैं निःसंदेह श्रद्धा शब्द उनके लिए महत्वहीन है किन्तु जिन्होंने उसके थोडा आगे तक चिंतन की सीमा को विस्तार दे चेतना की बौद्धिकता पर शोध किया है उनके लिए परिभाषा यहाँ से प्रारंभ होती है.! एक अच्छी प्रस्तुति विक्रमजीत सिंह जी.!

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 22, 2012

    वासुदेव जी…..नमस्कार…. आपने सही अवलोकन किया….. लेकिन लोगों की अपनी-अपनी विचारधारा होती है…. प्रोत्साहन के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद….

yogi sarswat के द्वारा
August 21, 2012

श्री विक्रमजीत सिंह जी , सादर नमस्कार ! बहुत दिनों के बाद दर्शन हुए आपके ! लेकिन एक सुन्दर और अच्छी , रचना के साथ ! ऐसा होता है विक्रमजीत सिंह जी , मन के भाव इस तरह के बन जाते हैं ! भले ही कोई चमत्कार न हो किन्तु कभी कभी मनुष्य का मन इतना दृढ और सटीक आंकलन कर देता है की उसे चमत्कार से कम नहीं कहा जा सकता ! आज बजरंगबली का दिन है और आज सुबह ही सुबह उनके दर्शन करा दिए आपने , साधुवाद !

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 21, 2012

    आदरणीय योगी जी…सादर… आज के दिन सुबह-सुबह बजरंगबली के दर्शन करने से और उनका नाम जपने से जीवन में आये हुए सभी तरह के कष्टों से छुटकारा भी मिलता है…… आपका हार्दिक धन्यवाद…….

ajay kumar pandey के द्वारा
August 20, 2012

आदरणीय विक्रमजीत जी नमन अनिल भैया का ब्लॉग जागरण द्वारा बंद कर दिया गया है उन्होंने अच्छे लेखों को न छापने पर जागरण को कुछ कह दिया था और दिनेशास्तिक जी जो प्रश्न कर रहे थे जागरण फीडबैक में उसका भी जवाब उन्होंने खुद दे दिया बस इसी बात से जागरण वाले गुस्सा हो गए और उन्होंने अनिल भैया जी का निष्काशन किया है हमने जागरण वालों से उन्हें ससम्मान मंच पर वापस लाने का अनुरोध भी किया पर जागरण नहीं मान रहा है एक बार आप भी जागरण वालों से अनिल भैया को वापस बुलाने का अनुरोध कीजिये ताकि हम सब उनकी खुबसूरत रचनाओं से वंचित न हो धन्यवाद अजय कुमार पाण्डेय

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 21, 2012

    प्रिय अजय भैया…. फीडबैक पर अभी देखा उनका कमेन्ट….. समझ नहीं आता….जरूरत क्या थी उनको किसी के फटे में टांग फंसाने की….ख़ैर…अनिल जी को मेल करके सारी बात पता करेंगे…फिर देखते हैं…क्या होता है….

ajay kumar pandey के द्वारा
August 20, 2012

आदरणीय विक्रमजीत सिंह जी नमन सबसे पहले तो बहुत बहुत आभार काव्यात्मक प्रतिक्रिया का आपने मेरी पोस्ट को इतना समय दिया और पढ़ा उसका हार्दिक आभार प्रकट करता हूँ और आपकी कृपा आगे भी प्राप्त करने की आशा रखता हूँ आप लोगो के ही आशीर्वाद से मेरा लेखन निखर रहा है यदि कोई कमियां मेरे लेखन में आपको दिखाई दें तो उसे भी उजागर कर दिया कीजिये क्योंकि आप लोग जब तक नहीं बताएँगे तो में अच्छा लेखन कैसे सीखूंगा आपकी कृपा आगे भी प्राप्त करने की आशा रखता हूँ धन्यवाद अजय कुमार पाण्डेय

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 20, 2012

    चिंता मत कीजिये अजय भाई……भगवान् ने चाहा तो हमारा-आपका साथ हमेशा बना रहेगा….. (आजकल अनिल भाई कहीं दिखाई नहीं दे रहे मंच पर…..कहीं बाहर तो नहीं गए…??? बताना…)

akraktale के द्वारा
August 20, 2012

विक्रमजीत जी                 सादर, बजरंगबाली कि कृपा आप और हम सब पर बनी रहे. सुन्दर कथा प्रस्तुति के लिए. आभार.

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 20, 2012

    आदरणीय अशोक जी…….सादर…. आपका हार्दिक धन्यवाद…….

rajpal singh के द्वारा
August 20, 2012

vikramjit bhai, ab sehat ka kya halchaal hai.

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 20, 2012

    राजपाल भाई जी….. अब आगे से बेहतर महसूस कर रहे हैं…. आपका बहुत-बहुत धन्यवाद…….

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
August 19, 2012

मान्य भाई विक्रमजीत सिंह जी , सादर अभिवादन !…. यह दुनिया बड़ी ही रहस्यमयी और चमत्कारों से भरी है यहाँ कुछ भी संभव है ! ऐसी ही सच्ची घटना का ज़िक्र मैं भी कभी करूंगा ! अत्यंत रोचक आलेख के लिए आप को बधाई !! पुनश्च !!

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 20, 2012

    आदरणीय विजय जी….सादर….. प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद….. आपकी रचना का इंतज़ार रहेगा…..

ashishgonda के द्वारा
August 19, 2012

आदरणीय! सादर प्रणाम,,,आपको स्वस्थ जानकर खुशी हुई. मैंने आपकी रचना ध्यान से पढ़ा, और आदरणीय दिनेश जी की प्रतिक्रिया कोई भी पढ़ा-मेरे उपनिषद ने मुझे ये भी सिखाया है “मनो तो देव नहीं तो पत्थर” और ये भी “समर में घाव जो खाता उसी का मान होता है छिपा ले वेदना को जो अमर वरदान होता है सृजन में छोट जो हथौड़ी और छेनी से वही पाषाण मंदिर में कहीं भगवान होता है” अच्छी सुन्दरकाण्ड में महत्व पर प्रकाश डालने के लिए धन्यवाद…. http://ashishgonda.jagranjunction.com/2012/08/13/%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B8-%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%A8/

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 20, 2012

    आदरणीय आशीष जी….सादर…. आपका हार्दिक धन्यवाद……

ajay kumar pandey के द्वारा
August 19, 2012

आदरणीय विक्रमजीत सिंह जी नमस्कार आप मंच पर आ गए बहुत ख़ुशी हुई आपने इस लेख के जरिये यह बता दिया की भक्ति में कितनी शक्ति है में भी हनुमान जी का भक्त हूँ तो यह कहना चाहता हूँ की आपके इस लेख को पढ़कर और देवता चित्त न धरई हनुमत सेई सर्व सुख करई संकट ते हनुमान छुडावे मन क्रम बचन ध्यान जो लावे sab पर राम तपस्वी रजा तिनके काज सकल तुम साजा अभी यहीं तक लिख रहा हूँ आपका मंच पर लोटने का स्वागत करता हूँ और अपने ब्लॉग पर आने का आपको आमंत्रण देता हूँ धन्यवाद अजय कुमार पाण्डेय

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 19, 2012

    प्रिय अजय जी….सादर…. आपका अतिशय धन्यवाद…. आपके ब्लॉग पर अवश्य आयेंगे……..

अजय यादव के द्वारा
August 19, 2012

विक्रम सर जी, सादर प्रणाम| आशा हैं की आप कुशलता पूर्वक होंगे |ईश्वर हमारे भीतर रहता हैं और हर प्रार्थना /प्रतिक्रिया का जवाब देता हैं ,वह सिर्फ एक लफ्ज कहता हैं “तथास्तु”|यदि हम कहे की ,मेरे जीवन में सुख समृद्धि प्रेम बढ़ रहा हैं तो इश्वर भी कहता हैं तथास्तु [granted]|हम केवल १०-१२% मस्तिष्क का उपयोग करते हैं [चेतन का] बाकि लगभग ९०%अवचेतन मन ही हमारा निजी भगवान हैं |हमारे धर्मो में प्रार्थना सकारात्मक आत्मसुझाव के जैसे होती हैं जों सकारात्मकता हेतु प्रेरित करती हैं |मेरए ब्लॉग इस तरह के लेखो से भरे पड़े हैं |

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 19, 2012

    आदरणीय अजय जी…सादर….. सत्य कहा आपने…..बात विश्वास करने की है…. आपका हार्दिक धन्यवाद……

MANJUSHARMA के द्वारा
August 19, 2012

विक्रम जी आपकी रचना सराहनीय है आस्था यदि सत्य है तो इस्वर का आभास अवश्य होता hai

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 19, 2012

    आदरणीया मंजू जी……आपका हार्दिक स्वागत है….. ऐसे ही स्नेह बनायें रखिये…धन्यवाद…..

D33P के द्वारा
August 18, 2012

विक्रम जी नमस्कार मंच पर आगमन पर स्वागत और शुभकामनाएं

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 19, 2012

    आदरणीया दीप्ति जी……सादर नमस्कार…. आपका स्वागत है….और हार्दिक धन्यवाद भी…..

rekhafbd के द्वारा
August 18, 2012

विक्रम जी ,अत्यंत रोचक सत्य घटना को आपने इस मंच पर बांटा .ईश्वर की प्राप्ति तर्क से नही भक्ति से ही होती है और विज्ञान तो तर्क पर आधारित है ,सच्चे मन से किसी भी रूप में परमात्मा की आराधना करो वह अवश्य ही फलीभूत होगी ,आभार

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 19, 2012

    आदरणीया रेखा जी……आपका हार्दिक धन्यवाद……

Chandan rai के द्वारा
August 18, 2012

विक्रम जी , इस कथा से यही सन्देश मिलता है की हमें सभी का आदर करना चाहिय बहुर प्रेरक प्रसंग !

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 19, 2012

    प्रिय चन्दन जी….. सराहना के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद….

Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
August 18, 2012

आदरणीय विक्रम जी, आपके इस लेख को पढ़कर अच्छा लगा, किन्तु मैं दिनेश जी की बातों से अधिक सहमत हूँ, हिन्दुओं के ३३ करोड़ देवी-देवता, मुस्लिमों के अल्लाह, सिखों के वाहे-गुरु, ईसाईयों के God कहाँ रहते हैं सब और कौन किसकी मदद करेगा? किस आधार पर करेगा? समाज में तो अन्याय और अनैतिकता बढती ही चली जा रही है….माना कुछ लोग नास्तिक होते हैं लेकिन ज़्यादातर तो आस्तिक हैं क्या वे इस अन्याय और अनैतिकता से ट्रस्ट नहीं…बहुत सी निर्दोष लड़कियां बेक़सूर होते हुए बलात्कार और हत्या का शिकार बना दी जाती हैं….कैसे रुकेगा ये सब? भगवान् भरोसे? क्षमा करें..

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 19, 2012

    आदरणीय अनिल जी…..सादर…. आपको रचना अच्छी लगी…..हार्दिक धन्यवाद….. अनिल जी…….प्रभु तो प्राणी मात्र में हैं……उनकी उपस्थिति ही आदमी को क्या से क्या बना सकती है…..बात विश्वास की है……वैसे भी कहते हैं….”भगवान् भी उसकी मदद करते हैं……जो अपनी मदद खुद करता है…..तो इसका अर्थ क्या हुआ…….प्रयास तो हमीं को करने पड़ेंगे…..प्रभु तो सिर्फ दयादृष्टि करते हैं…और उस दयादृष्टि से ही हमें आत्मबल मिलता है…..अपने प्रयासों को फलीभूत करने का…….. सादर…..

alkargupta1 के द्वारा
August 18, 2012

विक्रम जीतजी , श्रद्धा और विश्वास के साथ की गयी भक्ति में शक्ति तो होती है और कई बार कार्य भी सफल होते देखे गए हैं ईश्वर में आस्था और विश्वास व्यक्ति व्यक्ति पर निर्भर करता है……..जय वीर बजरंग बाली

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 19, 2012

    आदरणीया अलका जी…..सादर… अक्षरक्ष सत्य कहा आपने…… जय बजरंगबली…..

phoolsingh के द्वारा
August 18, 2012

विक्रम जी सादर प्रणाम, राम गाथा का इतना सुंदर वर्णन …………. जय जय बजरंग बली फूल सिंह

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 19, 2012

    सादर नमस्कार फूल सिंह जी….. आपका हार्दिक स्वागत और धन्यवाद भी….. जय बजरंगबली…..

manoranjanthakur के द्वारा
August 18, 2012

हनुमान गाथा का जो गान आपने सुनाया दिल को छु गया जय वीर हनुमान

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 19, 2012

    आदरणीय मनोरंजन जी…..आपका हार्दिक स्वागत और धन्यवाद भी….. जय वीर हनुमान…..

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
August 18, 2012

जय हनुमान ज्ञान गुण सागर.. आदरणीय नाती श्री, सस्नेह मेरा जीवन बजरंगबली की कृपा से ही चल रहा है. मैं काफी ठीक हूँ. इन्ही की कृपा है. लेख हेतु बधाई.

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 19, 2012

    आदरणीय नाना श्री…सादर…. जिस पर इनकी कृपा हुई…फिर उसे काहे की चिंता…. ”और देवता चित्त ना धरई….हनुमत सेई सरब सुख करई…” बजरंगबली आगे भी भली ही करेंगे……..

nishamittal के द्वारा
August 18, 2012

विक्रम जी मंच पर स्वस्थ होकर आगमन पर स्वागत और शुभकामनाएं .साथ ही ये कहना चाहूंगी कि आस्था तर्कों पर आधारित नहीं होती .जय बजरंगबली

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 19, 2012

    आदरणीया मातेश्वरी…. आपका हार्दिक धन्यवाद….. जय बजरंगबली…….

jlsingh के द्वारा
August 18, 2012

विक्रम जी, नमस्कार! बिस्वास तो है मुझे बचपन से… क्योंकि मैं भी एक बार महीनो बुखार में रहा था और अपने माता पिता जी को दीदी को रामायण पढ़कर सुनाने को कहता था .. साथ ही महसूस करता था कि हनुमान जी घर के छप्पर पर बैठकर राम कथा सुन रहे हैं. तब मैंने भी पढ़ा था – जहाँ रामकथा होती है हनुमान जी अवश्य आते हैं कथा सुनने के लिए! ये बाते महसूस करने की है, बिस्वास की है. बिस्वास से ही आत्मबल बढ़ता है. उदाहरण के साथ बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति!आभार सहित!

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 19, 2012

    आदरणीय जवाहर जी……सादर…. आप के विश्वास को हमारा कोटि नमन….. धन्यवाद……

    Bubbi के द्वारा
    October 17, 2016

    To Ivy:英文太屎,唔熟food pantry這個概念,是不是免費派糧的中心之類?在香港,我對這類設施沒有甚麼印象,或許是自己太孤陋寡聞也說不定。某些機構會做中介人聯絡商戶(如麵包舖)將即日賣剩的食物送往老人院或露宿者之家,這些計劃在性質上跟food pantry好像有點不同?如果說偶爾派派糧食也算food pantry,那麼香港至少有平安米…… = =;To ma0c5llabear:呵呵,要不是回到家裡有住家飯吃,我才不會搵命搏吃這樣的午飯。自己煮完帶飯當然是最抵的,不過也要有附設微波爐的固定辦公室才行&#1229r;旺角街市兩蚊斤菜,十蚊九個天津雪梨,以前我甚至試過在office煮麵食。剩下的雪梨還可以帶回去煲雪梨水&#6e292;加兩粒蜜棗,又甜又潤。

dineshaastik के द्वारा
August 18, 2012

विक्रम जी, सादर नमस्कार। आपको स्वस्थ जानकर अति प्रसन्न हूँ। मंच पर पुनः आगमन पर स्वागत। बहुत ही सुन्दर कल्पित रचना। किन्तु मेरे लिये अविश्वसनीय। क्षमा करें, मेरी  सोच इस विचारधारा के विपरीत है।

    PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
    August 18, 2012

    आदरणीय दिनेश जी, सादर कभी स्वाद भी बदल लिया करिए. आनंद सब मैं है.

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 19, 2012

    दिनेश जी….सादर…. आपका अति धन्यवाद…. अपने-अपने विचार हैं……दिनेश जी…..आपने ‘धन्ना भगत’ का नाम तो सुना ही होगा….असल में धन्ना जाट कौम का था…..मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं था उनका……लेकिन भगवान में आस्था जरूर थी…..खेत में काम करते हुए…खाना खाते वक़्त…वहीँ एक पत्थर पड़ा था……उस पत्थर को सामने रख के धन्ना ने कहा….”तू तो इस जग के कण-कण में विद्यमान है….तो इस पत्थर में भी जरूर होगा…….आ बाहर आ….और मेरे साथ खाना खा…..सरसों का साग और मक्की की रोटी…..अगर नहीं आएगा तो मैं भी खाना नहीं खाऊँगा…..(बाकि फिर कभी…) सादर दिनेश जी…..

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 19, 2012

    आदरणीय नाना श्री…. सत्य कहा आपने…आनंद सब में है……

Santosh Kumar के द्वारा
August 17, 2012

विक्रम जी ,..सादर नमस्कार भक्ति में बहुत शक्ति है ,.चमत्कार दीखते नहीं हो जाते हैं ,..बहुत बधाई

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 19, 2012

    संतोष जी…सादर…. सच कहा आपने…..भक्ति में बहुत शक्ति है…. प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए धन्यवाद….

satish3840 के द्वारा
August 17, 2012

विकम जी नमस्कार / आपकी लम्बे अरसे से कमी खली / ब्लॉग पर पुनह स्वागत हें / भक्ति में शक्ति तो हें / ये आत्म बल को निश्चित रूप से मजबूत करती हें / बहुत अच्छी अभिव्यक्ति /

    vikramjitsingh के द्वारा
    August 19, 2012

    आदरणीय सतीश जी…..नमस्कार… आपका कहना सत्य है….एक दुर्घटना की वजह से ही हम मंच पर समय नहीं दे पाए थे…..अब पूर्णतया स्वस्थ होने के बाद ही आप के सामने हाज़िर हैं…… रचना की सराहना के लिए धन्यवाद…….


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